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कद्दू, सीताफल या काशीफल की खेती कैसे करें-cultivate pumpkin,

कद्दू, सीताफल या काशीफल की खेती कैसे करें-How to cultivate pumpkin, betel leaf

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कद्दू की खेती, Kaddu ki kheti(pumpkin)


                                          

                             कद्दू या सीताफल या काशीफल
                                    ( Pumpkin)
               वानस्पतिक नाम  - Cucurbita moschata
                                     कुल - Cucurbitaceae     


संछिप्त परिचय -कद्दू का मूल स्थान अमेरिका है इसकी खेती का ढंग बिल्कुल लौकी के समान है अंतर केवल इतना है कि जहां लौकी की वर्षा की फसल को छप्परों इत्यादि पर चढ़ाया जाता है, कद्दू की बेल भूमि पर ही रेंगने दी जाती है लौकी और कद्दू की खेती पास-पास नहीं करनी चाहिए ऐसे लोगों का विश्वास है इस बात में केवल इतना ही पता है कि लौकी और कद्दू पर एक ही प्रकार के कीड़े मकोड़े लगते हैं, और एक फसल पर लगा कीड़ा दूसरी फसल को भी हानि पहुंचा सकता है अतः इन दोनों फसल को अलग अलग होगा ना ही सही होता है। 

भूमि 

कद्दू के लिए हल्की दोमट अथवा दोमट भूमि सर्वोत्तम रहती है भूमि से पानी निकास का समुचित प्रबंध होना चाहिए।भूमि कुछ-कुछ अम्लीय होने पर कद्दू की अच्छी उपज होती है। 

भूमि की तैयारी

कद्दू की अच्छी फसल लेने के लिए भूमि की एक बार किसी मिट्टी पलट हल से गहरी जुताई करनी चाहिए इसके बाद चार से पांच जुदाईयां देशी हल से करनी चाहिए प्रत्येक जुताई के बाद पटेला घुमाकर मिट्टी को समतल कर देना चाहिए। 

खाद तथा उर्वरक

काशीफल की अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए उसमें 300 से 400 कुंटल गोबर या कंपोस्ट खाद तथा 40 से 50 किग्रा नाइट्रोजन 40 से 50 किग्रा फास्फोरस 25 से 40 किग्रा पास कर देना चाहिए। गोबर की खाद से 1 माह पहले खेत की तैयारी के समय मिट्टी में मिला दे नाइट्रोजन की मात्रा फास्फोरस और पोटाश की मात्रा मिट्टी में मिला देंगे 45 दिन बाद टॉप ड्रेसिंग के रूप में जड़ों के पास देना चाहिए। 

बीज बोने का समय 

(अ)मैदानी मैदानी क्षेत्रों में

 1. ग्रीष्मकाल (जायद) 
नवंबर-मार्च। शीघ्र फसल के लिए इसे नवंबर में आलू की मेड़ों पर भी बोल देते हैं नदियां के कगार पर दिसंबर में बुवाई करते हैं इस फसल की पॉलिसी सुरक्षा करते हैं उन स्थानों में जायद की फसल फरवरी-मार्च में होते हैं। 

2.बरसात की फसल(खरीफ)-जून-जुलाई
(ब)पर्वतीय क्षेत्रों में-मार्च-अप्रैल 

बीज की मात्रा

कद्दू की जायद फसल लेने के लिए 6 से 7बीज प्रति हेक्टेयर आवश्यक होता है जुलाई में बोने जाने वाली फसल के लिए 4 से 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर प्राप्त होता है। 

बीज बोने का ढंग 

लौकी  की भांति काशीफल को भी गड्ढों (थालों) में और नालियों में बोते हैं काशीफल को 2.5 - 3 मीटर x 75 - 100 सेमी (पंक्ति xपौधे) की दूरी पर होते हैं। 
ग्रीष्म फसल -   2. 5 x.75 मि० 
वर्षा फसल -      3 x1.0  

उपरोक्त दूरी पर ताला बनाकर एक स्थान पर 3 - 4बीज 2.5 - 3 सेमी गहराई पर बोना चाहिए। 
बाद में एक स्वस्थ पौधा ही बढ़ने के लिए छोड़ते हैं नालियों में बोने पर नालियां निर्धारित दूरी पर 50 सेंटीमीटर चौड़ी 25 से 30 सेंटी मीटर गहरी बनाई जाती है जिसमें खाद डालकर 75 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज को बो दिया जाता है। 

सिंचाई 

जायद फसल में प्रति सप्ताह सिंचाई की आवश्यकता होती है पानी पहले नालियों में दिया जाता है और खेत की बेल फैल जाने पर बेल भरने की सारी जगह में पानी फैलाया  जाता है। खरीफ की फसल में सिंचाई वर्षा ना होने पर आवश्यक होती है सामान्य वर्षा होने पर प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती वर्षा का फालतू पानी खेत से बाहर निकालते रहना चाहिए। 

निकाई- गुड़ाई 

जायद की फसल में दो से तीन बार निराई करने की आवश्यकता होती है। जब तक बेल फैल कर भूमि में भली-भांति धक नहीं लेती निकाई गुड़ाई की जाती रहती है। खरीफ ऋतु में बोई जाने वाली फसल में खरपतवार अधिक जोर पकड़ते हैं।  अतः उन नियंत्रण रखने के लिए तीन से चार बार निकाय -गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है कद्दू की लताएं जमीन पर ही फैलाई जाती हैं अतः फल  भूमि पर ही लगते हैं। 

फसल की उपज 

काशीफल की औसत उपज 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। ग्रीष्म कालीन फसल की उपज 400 क्विंटल तक हो जाती है।  क्योंकि ग्रीष्मकालीन फल 20 से 25 किलो तक का हो जाता है लोगों के साथ काशीफल के 20 नवंबर में बो दिए जाते हैं। वर्षाकालीन फसल में कम पर मिलती है क्योंकि बेल को ऊपर नहीं चढ़ाया जा सकता।

कद्दू के  किट तथा रोग 

कद्दू का लाल किट 

यह किट लाल चमकदार और लंबे आकार का होता है या फलों में छेद कर देता है इसके बच्चे फसल की जड़ों में छेद करके खाते हैं।  

 इनकी रोकथाम के लिए सेविन धूल का 10 से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें साइपरर्मेथ्रिन का 0.15% का छिड़काव बहुत ही कारगर सिद्ध हुआ है। 

कद्दू का मक्खी 

इस किट  की मादा कद्दू के फल के छिलके के अंदर अंडे देती हैं, इससे छोटे-छोटे कीट पैदा होकर अंदर ही अंदर फलों को खाते हैं वह सड़ा  देते हैं इनकी रोकथाम के लिए सेविन धूल का 0.2 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। 

पाउडर की तरह फफूंदी

इस रोग के कारण पत्तियों की ऊपरी सतह तथा तनाव पर सफेद पाउडर जैसा पदार्थ जम जाता है जिसके फलस्वरूप समय से पहले ही पत्तियां गिर जाती हैं। 
इसकी रोकथाम के लिए फसल पर 0.0 6% कैराथेन ( 60 ग्राम दवा100 लीटर पानी )के घोल का छिड़काव करें। सुटोक्स 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर  से  घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करने से अत्यधिक लाभ मिलता है। 

 कद्दू का बीज उत्पादन कैसे करे 

लौकी, काशीफल,तोरई, करेला, खरबूजा का बीज उत्पादन- कद्दू वर्ग की फसलों का बीज पैदा करने के उद्देश्य से हम कुछ स्वस्थ व चुने हुए रोगमुक्त फलों को बेल पर पकने के लिए छोड़ देते हैं जब फल पूर्ण रूप से पक कर तैयार हो जाए तो फलों को तोड़कर कुछ दिनों के लिए रख दिया जाता है उसके बादलों को चीर कर बीज निकाल लिए जाते हैं बीज को पानी से धोकर दूध में अच्छी तरह सुखाकर शीशियों में बंद कर रख दिया जाता है। 


खरबूजा की उन्नतशील खेती कैसे करें How to cultivate melon

खरबूजा की उन्नतशील खेती कैसे करें How to cultivate melon




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                                           खरबूजा
                                         (MUSK melon)
                          वैज्ञानिक नाम- Cucumis melo.ver.Reticulatus
                                       
                                      कुल - Cucubitaceae 


खरबूजा एक स्वादिष्ट फल है, जिसका प्रयोग पराया फल के रूप में ही खाने के लिए किया जाता है,असल में या निर्धनों का फल है। लेकिन अमीर और गरीब सभी लोग इसे बड़े प्रेम से खाते हैं। अरे फल की तरकारी भी बनाकर खाई जाती है खरबूजा प्रकृति में गर्म और तरह स्फूर्तिदायक व तरावट देता है। 

 कब्ज मूर्त और पसीने की रुकावट में लाभदायक है दोनों समय के भोजन के मध्य का समय तरबूज खाने के लिए सर्वोत्तम रहता है।  खरबूजा पकने के समय इसको जितना भी अधिक गर्मी और लू मिलती है उतना ही इस में मिठास आती है खरबूजे के बीज निकल जाने पर जो गिरी प्राप्त होती है। वह अमीरों के रूप में प्रयोग आती है इसके बीज अत्यंत पौष्टिक कहे जाते हैं बीच में 40 से 45% तेल होता है। 

 जलवायु  

खरबूजे की अच्छी खेती के लिए उचित तापमान और सुखे  जलवायु की आवश्यकता होती है विशेषकर फसल के पकने की अवस्था में अधिक तापमान खुली धुप तथा गर्म हवा  और सुस्क हवा मिलने पर फलों की मिठास में वृद्धि होती है वातावरण में अधिक नमी होने पर फसल में रोग लगने का भय रहता है और फलों का विकास उचित ढंग से नहीं हो पाता। 

भूमि और उसकी तैयारी

खरबूजा कई तरह की मिट्टी में उगाया जाता है लेकिन बलुई दोमट और कचहरी दोमट मिट्टी के उत्पादन के लिए उपयुक्त मानी जाती है भारी मटियार मैं इसको नहीं गाना चाहिए इसकी खेती के लिए भूमि का अनुकूलतम PH मान 6 से 6. 7  के बीच है। 

 नदी तट एवं राजस्थान के रेतीले इलाकों में खरबूजे की खेती विशेष रूप से की जाती है खेत तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाला हल गहरी जुताई करके पांच से छह बार देशी हल से जुताई करनी चाहिए जिससे मिट्टी अच्छी तरह भुरभुरी हो जाए यदि खेत में नमी की कमी हो और अंतिम जुताई से पहले हल्की सिंचाई कर देनी चाहिए। 

खाद तथा उर्वरक

 खाद की आवश्यकता मिट्टी की किस्म और उर्वरा  शक्ति पर निर्भर करती है साधारण रेतीली भूमि में खाद अधिक मात्रा डालनी चाहिए मध्यम उर्वरता वाली बलुई दोमट में 250 क्विंटल गोबर की खाद 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन 25 से 30 किलोग्राम फास्फोरस और 20 से 30  पोटाश किलोग्राम प्रति हेक्टेयर प्रयोग करने से अच्छी उपज प्राप्त हो जाती है।

फास्फोरस और पोटाश की  पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा  खेत की तैयारी के साथ ही डाली जाती है तथा नाइट्रोजन की बची हुई शेष मात्रा को फुल  आने के समय डालना चाहिए गोबर की अच्छी तरह चढ़ी हुई के लगभग 1 महीने पहले खेत में अच्छी तरह से मिला देना चाहिए।


बुवाई का समय 

बुवाई की विधि बीज के बोने के लिए 1.5 मीटर चौड़ी और सुविधाजनक लंबाई वाली क्यारियां बनाई जाती हैं जो क्यारियों के बीच 7 सेंटीमीटर चौड़ी नाली रखी जाती है क्यारियों में दोनों किनारों पर 90 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज बोए जाते हैं प्रत्येक थैले में 4 से 6 बीच लगभग 1.5 सेंटी मीटर की गहराई पर होना चाहिए बीज की दर 3 से 4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर

सिंचाई और निराई 

बीज बोकर पहली सिंचाई करने के पश्चात खरबूजे बढ़ने तक लगभग 1 सप्ताह के अंदर पर सिंचाई करते रहना चाहिए जब फलों का आकार आधे से कुछ अधिक बड़ा हो जाए तो 12  से 15दिन के अंतर पर सिंचाई करना पर्याप्त होता है। नालियों में यादों में अधिक पानी न भर जाए अन्यथा पौधों पर रोगों और कीटों का आक्रमण जल्दी होता है ,नदी तट पर आए के बाद दो बार पानी देना पर्याप्त होता है उसके बाद पौधों की जड़ें इतनी बढ़ जाती हैं रेत के नीचे कि पानी सतह पर पहुंच जाती हैं जिससे सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है।

कीट एवं रोकथाम 

खीरा वर्ग की सभी सब्जियों में लगने वाले कीट खरबूजे में भी बहुत हानि पहुंचाते हैं सबसे अधिक हानि रेड पंपकिन बीटल ,फल मक्खी से होता है।

1. रेड पम्पकिन बीटल 

पहचान -यह लाल रंग का उड़ने वाला कीट है जो पौधों के उठते ही पत्तियों को खाना आरंभ कर देता है

रोकथाम - पौधों पर मेलाथियान 5% धूल का 30 से 35 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव करे।  या  0 . 15%सैपरमेथ्रीन के घोल में तीन केवल 150 मी 0 लीटर 100  लीटर पानी में छिड़काव करना चाहिए।

2. ईपीलेेकना बीटल 

पहचान -इसके ऊपर काले रंग के गोल धब्बे होते हैं इसके बच्चे और वयस्क दोनों ही पत्तियों को खाते हैं काटने वाली सुंडी रात में निकल कर छोटे पौधों को जड़ से काट देती है इसके रोकथाम के लिए उपयुक्त विधि बताए गए कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग किया जा सकता है काटने वाली संडे को मारने के लिए पौधों के साथ-साथ जमीन पर कीटनाशक दवाओं को डालना चाहिए

3. फल मक्खी (फ्रूट फ्लाई )


पहचान -यह  खरबूजा की अत्यंत हानिकारक कीट है यह मक्खी कुछ पीले रंग की होती हैं तथा फलों पर अंडे देते हैं कभी-कभी 70 से 80% तक फल इससे ग्रसित हो जाते हैं निम्न विधियों से इनके आक्रमण को कम किया जा सकता है।


रोकथाम -ग्रसित फलो को एकत्रित करके जमीन में गहरा गाड़ दें।  खेत को तैयार करते समय एल्ड्रिन 5% धूल को जमीन की ऊपरी सतह पर बुरकाव करके  मिट्टी में मिला देना चाहिए।

बीमारी और रोकथाम 

1. चूर्णी फफूँदी 

यह फफूंद पत्तियों और तनो पर आक्रमण करती है पुरानी  पत्तियों के निचले भाग  में गोल सफ़ेद धब्बे प्रकट होते है ये धब्बे धीरे - धीरे बड़े होने लगते हैं। और इनकी संख्या में वृद्धि होती रहती है जिससे यह पत्तियों  के ऊपरी सतह पर छा जाते हैं।  

 इसका नियंत्रण करने के लिए लक्षण प्रकट होते ही रोग ग्रसित पौधों को उखाड़ दे। और पौधों पर घुलनशील गंधक जैसे सल्फेक्स  अथवा इलोसाल के 0.3 प्रतिशत घोल का छिड़काव करें 3 सप्ताह के अंदर पर तीन छिड़काव करें।

2. रोमिल  फफूँदी 

यह अधिक वर्षा और नमी वाले क्षेत्र में होती है पत्तियों के ऊपर सतह पर पीले रंग के धब्बे प्रकट होते हैं जो बाद में भूरे रंग के होने लगते हैं नवी अधिक होने पर पतियों की निचली सतह पर बैंगनी रंग के जीवाणु दिखाई देते हैं साधारणता प्रारंभ में धब्बे पत्तियों के मध्य में होते हैं। 

 जो धीरे-धीरे बाहर की तरफ की सतह पर फैलते हैं इसके नियंत्रण के लिए Rog ऋषि पौधों को निकाल देना चाहिए और पौधों पर इंडोफिल एम 45 की 2.5 किलोग्राम मात्रा 1000 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। 

उपज 

उन्नत विधियों द्वारा करने पर  खरबूजे की उपज 150 से 200 कुंतल प्रति हेक्टेयर आसानी से प्राप्त होती है। 


तोरई की उन्नतशील खेती कैसे करे - How to cultivate high quality of tomai

तोरई की उन्नतशील खेती कैसे करे How to cultivate high quality of tomai



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                                                तोरई
                                           (Sponge Gound)
                      वैज्ञानिक नाम - Luffa Cylindrica Roem
                                   
                                       कुल -Cucurbitaceae

तोरई की खेती 

भूमि 

तोरई की फसल के लिए हल्की दोमट अथवा दोमट मिट्टी सर्वोत्तम रहती है लेकिन तोरई  की फसल भी उन सभी मिट्टी में उत्पन्न की जा सकती है जहां लौकी उगाना संभव है। 

भूमि की तैयारी  

लौकी और करेले की फसल के समान तोरई की फसल के लिए भी भूमि एक बार किसी मिट्टी पलट हल से जोड़कर तीन से चार बार देशी हल से जूते नहीं चाहिए।  और पटेला चलाकर भूमि को समतल कर देना चाहिए उन की तैयारी के समय उसमें पर्याप्त मात्रा में कम से कम 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए। 

खाद तथा उर्वरक 

खेत की तैयारी करते समय लगभग 250 से 300 क्विंटल गोबर की सड़ी हुई खाद बुवाई के एक माह पहले मिट्टी में मिला देनी चाहिए खाद की आवश्यकता निम्न प्रकार होती है गोबर की खाद 250 से 300 किलो मीटर तथा 30 से 40 किग्रा नाइट्रोजन 25 से 30 किग्रा फास्फोरस 30 से 40 के ग्रह प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की एक बटे तीन फास्फोरस की मात्रा में बीज बुवाई के पहले मिट्टी में मिल आते हैं। 

 नाइट्रोजन का एक बटे तीन भाग पौधों में चार से पांच पतियों ने पत्थर एक बटे तीन भाग फूल आने पर पौधों के चारों ओर टॉप ड्रेसिंग द्वारा देते हैं। 

बुवाई का समय 

तोरई की फसल मैदानी भागों में वर्ष में दो बार ली जाती है WhatsApp ग्रीष्म ऋतु में वर्षा वाली फसल के लिए बीजों की बुवाई जून-जुलाई में करते हैं तथा गर्मी वाली फसल नवंबर से फरवरी तक बोई जाती है अगेती फसल जिसमें 20 दिसंबर में ही बोए जाते हैं जमाव ना होने पर ठंड से बचाना चाहिए   पहाड़ों पर तोरई  20 अप्रैल से जून तक बोए जाते हैं। 

 बीज की मात्रा 

4 से 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर 

खरीब की फसल में कम जायद में अधिक बार प्रयोग करते हैं। 

 बुवाई का ढंग 


तुरई की  बुवाई लौकी की भांति की जाती है तुरई की बुआई गड्ढों में नालियों में क्यारियों में की जाती है। 

फसल अंतरण                                          ग्रीष्म फसल                                                 वर्षा ऋतू की फसल 

                                                                 2 × 0. 5                                                                 3  × 0. 75 

सिचाई व निकाई -गुड़ाई 

पानी की आवश्यकता मौसम और भूमि की किस्म पर निर्भर करती है। बरसात में प्राया सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती वर्षा पर्याप्त ना होने पर आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु की फसल में प्रारंभिक दिनों में लगभग 10 दिनों के अंतर पर तथा  बाद में तापक्रम बढ़ने पर 5 से 6 दिनों के अंतर पर सिंचाई की आवश्यकता हो जाती है खेत को खरपतवार रहित रखने के लिए समय-समय पर निराई करते रहना चाहिए।

सहारा देना

 शाखा धार सूखे पेड़ों की डालियां बांस की पत्तियों का बहाना बनाकर बैलों को जल चढ़ाने से बरसात की फसल में काफी लाभ होता है।  इससे फलों को गीली मिट्टी के संपर्क में आकर चढ़ने से बचा लिया जाता है और पढ़ाई में भी सुविधा होती है। ग्रीष्म ऋतु की फसल पर आया जमीन पर फैलने देते हैं तोरई में नर और मादा फूल अलग-अलग पौधों पर आते हैं यह दिन और फूल के पुंकेसर वालों की भर्ती गांव के ऊपर रगड़ जाए तो परागण हो सकता है।

बीमारियाँ तथा रोकथाम 

1. चूर्णी फफूदी 

पहचान -इस बीमारी का आक्रमण पत्तियों एवं तनो  पर होता है पहले पुरानी पत्तियों पर सफेद रंग के गोल धब्बे उत्पन्न होते हैं जो धीरे-धीरे आकार और संख्या में बढ़कर पूरी पत्तियों पर छा जाते हैं पत्तियों  की सतह पर सफेद चूर्ण सा जमा  हुआ दिखाई देता है रोग का अधिक प्रकोप होने पर पत्तियों का हरा रंग समाप्त होने लगता है और यह पीली पड़ कर अंत में भूरी  हो जाती हैं और इन पर झुर्रियों से पड़ जाती है

रोकथाम -लक्षण प्रकट होते ही ग्रसित भाग को निकाल दें। 0. 06 % केराथेन  के घोल का 3 सप्ताह के अंतर पर तीन छिड़काव करें। 

2.रोमिल फफूँदी 

पहचान -पीले से लेकर लाल भूरे रंग के धब्बे पत्तियों की ऊपरी सतह पर तथा बैंगनी रंग के धब्बे पत्ती की निचली सतह पर प्रकट होना इसका मुख्य लक्षण है। रोग ग्रसित पौधों पर लगे फल को ठीक से पकने नहीं और फल में उनका स्वभाव का रंग भी उत्पन्न नहीं हो पाता है।

रोकथाम -इंडोफिल एम 45 के 0. 25 प्रतिशत 250 ग्राम 100 लीटर पानी में घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतर पर 3 बार करें।

3. मोजेक

यह रोग माहू द्वारा फैलता है अतः इन्हें मारने के लिए साईपरर्मेथ्रिन 0.15 प्रतिशत (150 मिली 100 लीटर पानी) दवा का प्रयोग करते हैं रोगी पौधों को निकाल कर जला देना चाहिए।

किट तथा उनकी रोकथाम 

1 . लौकी का लाल भृंग (रेड पंपकिन बीटल )

 यह लाल रंग का उड़ने वाला कीट है पौधों के उठते ही इनकी पत्तियों को खाना आरंभ कर देते हैं।

रोकथाम -पौधों पर मैलाथियान 5% धूल 30 से 35 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर का बुरकाव   या 50% घुलनशील धूल के 0.2 प्रतिशतघोल 200 ग्राम दवा 100  लीटर पानी में छिड़काव करना चाहिए साईपरर्मेथ्रिन 0.15 प्रतिशत के घोल का छिड़काव बहुत ही कारगर सिद्ध होता है।


2 . तने काटने वाली सूंडी (कटवर्म )

पहचान - यह सुंडी रात में निकलकर छोटे पौधों को भूमि की सतह से काट देते हैं दिन में या घास फूस में छिपी रहती हैं।  

रोकथाम -इनकी रोकथाम के लिए लिन्डोन  1.3 प्रतिशत या  हेप्टाक्लोर (20 से 25 किलोग्राम )प्रति हेक्टेयर को बीज से बुवाई से पहले खेत में मिला देते हैं

3. माहू 

रोकथाम -इनकी रोकथाम काफी हद तक उपरोक्त कीटनाशक दवाओं से ही हो जाएगी किंतु आक्रमण अधिक है।  तो साईपरर्मेथ्रिन 0.15% 150 मिलीलीटर 100 लीटर पानी में छिड़काव करना चाहिए।  इस दवा के छिड़कने के बाद 7 दिन तक फल नहीं तोड़ना चाहिए। 

4. फल की मक्खी (फ्रूट फ्लाई )

पहचान -वयस्क मक्खी कुछ पिले लाल रंग की होती है जो फलो में अण्डे देती है। कभी -कभी 50 %तक फल इससे ग्रसित हो जाते है। 

रोकथाम -रोग ग्रसित फलो को इकट्ठा करके जमीन में गहरा गाड़ देना चाहिए। 
 बेल पर फूल आते ही सेविंन  0. 2% 200 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में अथवा साईपर्मेथ्रिन में 0 . 15% से 150 मिलीलीटर दवा 100 लीटर पानी में घोल का छिड़काव भी किया जा सकता है। 

उपज 

100-125  कुंतल प्रति हेक्टेयर 


करेले की उन्नतशील खेती कैसे करें

                            करेला (Bitter Gourd)
                   वानस्पतिक नाम -(Mamordica charantia L.)
                                कुल -(Cucurbitaceae)

करेले की  खेती कैसे करें-






करेले की उन्नतशील खेती कैसे करें -How to cultivate bitter gourd

संछिप्त परिचय -

करेले की खेती संपूर्ण भारत में की जाती है इसका फल खुरदरी सतह वाला और कड़वा होता है लेकिन उच्च पोषक तत्वों और औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण इस सब्जी का जन जीवन में बड़ा ही महत्व है करेला ग्रीष्म ऋतु की मुख्य सब्जी है तथा स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से बहुत गुणकारी है करेले की संपूर्ण खेती भारत में की जाती है इसके फल को सब्जी के रूप में पकाकर, फ्राई करके तथा कलौजी के रूप में प्रयोग करते हैं करेला खाने में कुछ कड़वा होता है लेकिन इसकी सब्जी बहुत ही लाभकारी होती है इसकी इस की सब्जी पेट के कीड़ों को मारती है

 मधुमेह के रोगियों के लिए करेले की सब्जी विशेष रूप से लाभकारी होती है रक्त विकार तथा पीलिया आदि रोगों में इसकी सब्जी का सेवन लाभकारी होता है करेले के रस को सिर की खाल में छाले हो जाने पर प्रयोग करते है तथा  जलने के घाव  और  फोड़ो पर भी लगाया जाता है

 करेले में विटामिन A,B,C तथा खनिज पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं

करेला की उत्पत्ति एवं इतिहास 

करेले का जन्म स्थान सम्भवता पुरानी  दुनिया  सूखे  क्षेत्र विशेष  अफ्रीका तथा चीन माने जाते हैं यहां से इनका वितरण संसार के अन्य भागों में हुआ भारत में इसकी जंगली जातियां आज भी उगती देखी गई हैं

जलवाऊ 

यह गर्म तथा नम जलवायु की फसल है फिर भी इस में विभिन्न प्रकार की जलवायु को सहन करने की पर्याप्त क्षमता है इसको अपेक्षाकृत कम तापमान वाले क्षेत्रों में भी उगाया जा सकता है पाले  से इसकी फसल को भारी हानि होती है इसके बीजों का बीज चोल काफी कठोर होता है इसलिए अंकुरण पर्याप्त नमी का शोषण ना होने के कारण धीरे-धीरे  और और अधिक समय में होता है

भूमि तथा उसकी तैयारी

 करेले की खेती लगभग सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती हैं परंतु बलुई दोमट भूमि जिसमें जल निकास की उचित व्यवस्था हो वही भूमि सर्वोत्तम रहती है अच्छी उपज के लिए भूमि में जीवाश्म पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए करेले की सफल खेती के लिए भूमि का पीएच मान 6. 0 से 7. 0 के बीच होना चाहिए खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करने के बाद तीन से चार जुताई देशी हल या हैंरों से करना चाहिए प्रत्येक जुताई के बाद पटेला चलाकर खेत को समतल बना लिया जाता है

बीज और बुवाई 

1. बोने का समय तथा बीज की मात्रा

(अ)मैदानी  क्षेत्रो में-
      ग्रीष्म ऋतू की फसल -नवम्बर -मार्च 
      वर्षा ऋतू की फसल -  जून जुलाई  

(ब)पहाड़ी क्षेत्रो में 
     मार्च से जून तक 

सामन्य रूप से 80 -85 % जमाव क्षमता वाला 6 से 7 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर की बुवाई  लिए पर्याप्त होता है।  

2. बीज बोने की विधि तथा दुरी  

करेले को क्यारियों ,नालियों या गड्ढो में बोया जाता है बोने की दुरी निम्न प्रकार रखनी चाहिए -
ग्रीष्म फसल                                                                                वर्षा ऋतू फसल 
200 *50                                                                                      250 *60 


करेले के बीज को सीधे खेत में ही बोया जाता है 

ग्रीष्म ऋतु वाली अगेती फसल बोने के लिए बीज को पहले भिगोकर तथा बनावटी गर्मी देकर बीज को अंकुरित कर लेते है तैयार खेत में 4 से 5 मीटर लम्बी 2.0 मीटर चौड़ी क्यारिया बनाई जाती है प्रत्येक दो क्यारियां बनाई जाती हैं

 प्रत्येक दो क्यारियों के बीच 60  सेंटीमीटर चौड़ी नाली छोड़ देते हैं बीज इन  क्यारियों के दोनों किनारों पर बने थालों में बोए जाते हैं एक थाले से दूसरे थाले  की दूरी 50 सेंटीमीटर रखते हैं प्रत्येक थाले  में 3  से 4  बीज बोते हैं बीज 2 से 3 सेंटीमीटर से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए


खाद तथा उर्वरक 

करेले की अधिकतम पैदावार लेने के लिए सही समय पर उचित मात्रा में खाद और उर्वरक दोनों का ही प्रयोग आवश्यक है खेत की तैयारी के समय गोबर की सड़ी हुई खाद ढाई सौ से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला देनी चाहिए इसके अलावा 30 से 40 किलोग्राम नाइट्रोजन 25 से 30 किलोग्राम फास्फोरस तथा 20 से 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देने के लिए उर्वरकों का प्रयोग करते हैं

सिचाई तथा जल निकास 

करेले की फसल में सिंचाई की आवश्यकता मौसम तथा भूमि की किस्म पर निर्भर करता है बरसात में बोई गई फसल में प्रायः सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती परंतु जब लंबे समय तक वर्षा ना हो तो ऐसी दशा में सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है 

वर्षा ऋतु वाली फसल में जल निकास का अच्छा प्रबंध होना बहुत ही जरूरी है क्योंकि खेत में वर्षा का फालतू पानी इकट्ठा हो जाने पर पौधे पीले पड़ जाते हैं और बाद में मर जाते हैं ग्रीष्म ऋतु की फसल में प्रारंभिक दिनों में लगभग 10 दिन के अंतर पर और बाद में तापमान बढ़ने पर 6 से 7 दिन के अंतर पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है साधारण तरीके से ग्रीष्म ऋतु की फसल में 8 से 10 सिचाइयों की आवश्यकता पड़ती है

खरपतवार नियंत्रण 

आवश्यकता अनुसार समय-समय पर निराई गुड़ाई करके खेत को खरपतवार से साफ रखना चाहिए जब बेले पूर्ण रुप से फैल जाए  निराई-गुड़ाई करना बंद कर देना चाहिए साधारणता वर्षा ऋतु की फसल में तीन से चार  ग्रीष्म ऋतु की फसल में लगभग 2 निराई गुड़ाई की आवश्यकता पड़ती है

सहारा देना 

करेले की फसल को सहारा देना अति आवश्यक है ताकि फलों को गीली मिट्टी के संपर्क में आकर सड़ने से बचाया जा सके इसके लिए शाखा दार पेड़ों की सूखी डाली आधारित याद की लकड़ियां या बांस की पत्तियों का प्रयोग करते हैं वर्षा ऋतु वाली फसल को सहारा देना अधिक लाभप्रद होता है  सहारा देने से फलों की तुड़ाई में सुविधा होती है तथा फलों का आकार और रंग भी अच्छा लगता है


 रोग नियंत्रण 

पाउडर की तरह फफूंदी

इस रोग के फलस्वरूप पत्तियों पर सफेद और पीले रंग का चूर्ण जैसा पदार्थ इकट्ठा हो जाता है और बाद में बदामी रंग के में बदलकर पत्तियां समाप्त हो जाती हैं इससे बचाव के लिए केरातिन दवा 7 ग्राम दवा 2 लीटर पानी में 15 दिन के अंतर पर लगभग 3 छिड़काव करने पड़ते हैं

कोमल फफूंदी

यह फफूदी केवल पत्तियों पर आक्रमण करती हैं जिन क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती है वहां इस रोग का प्रकोप अधिक होता है पतियों की ऊपरी सतह पर पीले से लेकर भूरे रंग के धब्बे पड़ते हैं तथा निचली सतह पर रुई के समान मुलायम वृद्धि होती है रोगी पौधों पर फल कम लगते हैं इसकी रोकथाम के लिए डायथेन एम-45 दवा के 0.2 प्रतिशत घोल  200 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में 10 से 15 दिन के अंतर पर तीन छिड़काव करते हैं

 किट नियंत्रण 

रेड पम्पकिन बिटिल 

यह कीट लाल रंग का उड़ने वाला कीट होता है पौधों के उगते ही उन्हें खाना आरंभ कर देते हैं इनकी रोकथाम के लिए सेविन  10% धूल का 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करते हैं अथवा 1.5 मिलीलीटर साईपर्मेथ्रिन प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने पर बहुत ही प्रभाव कारी होता है

ऐपीलेकना बिटिल  

इस किट  पर काले रंग के गोल धब्बे होते हैं यह किट  भी अंकुरित हो रहे छोटे पौधों को खाते हैं इस कीट का नियंत्रण  10% धूल का 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करते हैं अथवा 1.5 मिलीलीटर साईपर्मेथ्रिन प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने पर बहुत ही प्रभाव कारी होता है

कीड़े काट cut worm

इस किट  की सुंडी रात में निकल कर छोटे पौधों को भूमि की सतह से काट देती हैं इस कीट की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन  5% धूल हेप्टाक्लोर  धूल  को 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से फसल बोने से पहले मिट्टी में मिला देना चाहिए

 माहु (Aphids)

ये किट की पत्तियों का रस चूस लेते हैं इनकी रोकथाम के लिए फल के आने से पहले की अवस्था में साईपर्मेथ्रिन 0.15% (150 मिलीलीटर  दवा 200 लीटर पानी में )छिड़काव करना चाहिए

फल की मक्खी (FRUIT FLY)

यह किट फलों की ऊपरी सतह को ठीक नीचे अंडे देती है जिनसे बाद में छोटे-छोटे किट  निकलते हैं जिन्हें मैंगट कहते हैं यह मैंगेट फूलों की गुदों को खाते हैं और इस प्रकार उन्हें सड़ा  देते हैं इनकी रोकथाम के लिए जैसे ही फूल आना आरंभ हो जाए (सेविन  दवा 0.2 प्रतिशत घोल  200 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में )15 दिन के अंतर पर तीन छिड़काव करना चाहिए साथ ही साथ टाट  के टुकड़ों पर निम्नलिखित प्रकार से बनाए गए मिश्रण  लगाकर खेत में कई स्थानों पर रखना चाहिए ताकि किट इसे  खाकर मर जाएं

1 . ईस्ट प्रोटीन 500 ग्राम 
2 . मैलाथियान (25 %डब्लू पी ० ) 900 ग्राम 
3 . पानी 13. 5  लीटर 


हेलो दोस्तों कैसे है आप सब  कैसी लगी आपको यह जानकारी हमें कमेंट में जरूर बताये और हाँ एक बात और अगर आप के मन में कोई सवाल है तो आप हमसे पूछे धन्यवाद !


लौकी की खेती कैसे करें . help you hindi

लौकी की उन्नतशील खेती कैसे करें - (How to cultivate gourd's advanced farming )




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                                                 लौकी            
                                             (Bottle Gourd)
                            वानस्पतिक नाम  Lagenaria siceraria
                                              कुल  - Cucurbitaceae
                                                                                   

उत्पत्ति का स्थान 

लौकी से मानव भोजन का नाता बहुत पुराना जाना जाता है मनुष्य शायद उसके गुणों से अपनी सभ्यता के प्रारंभिक दिनों में ही परिचित हो गया था मेक्सिको की गुफाओं ईशा 7000 से 5500  ई ०  पूर्व मिस्र के पुराने पिरामिडों 3500 से ३३०० पूर्व में उपस्थित शायद इसी बात का घोतक है भारत में इसकी खेती 2000 वर्ष पूर्व होती आ रही है भारत में मालाबार तट और देहरादून के जंगलों अफ्रीकी देश मूल का तथा इथोपिया में यह आज भी जंगली रुप में पाई जाती है अनुमान लगाया जाता है कि भारत से अफ्रीका था देशों में फैली है। 

भूमि तथा उसकी तैयारी 

लौकी की खेती प्रायः सभी प्रकार के भूमियों में की जा सकती है परंतु अच्छी उपज के लिए 2 मिनट या बलुई मिट्टी जिसमें जीवाश्म की पर्याप्त मात्रा हो तथा जल निकास का उचित प्रबंध हो सर्वोत्तम रहती है लौकी की फसल 6.0 से 7.0 PH वैल्यू में अच्छी उपज देती है। 

खेत की तैयारी लौकी बोने के ढंग पर निर्भर करती है यदि तालों में बीज की बुवाई करनी है तो खेत से घास इत्यादि निकालने के लिए एक या दो जुदाई करें या है रो चलाना चाहिए इसके बाद छालों की भूमि में 15 से 20 सेंटीमीटर की गहराई तक को देना चाहिए यदि बीज की बुवाई नालियों में करनी है तो समस्त खेत की तैयारी एक समान करनी चाहिए जिसके लिए तीन से चार जुताइयाँ पर्याप्त रहती हैं। 

बोने  का समय 

लौकी की बुवाई वर्ष में तीन बार की जाती है  -
1. फरवरी -मार्च (जायद फसल )-बोने के 2 माह बाद फल लगना आरंभ हो जाता है और फल अप्रैल से जून तक प्राप्त होते हैं। 

2. जून -जुलाई (बरसाती फसल )-फल अक्टूबर से दिसंबर तक प्राप्त होते हैं। 

3. अक्टूबर- नवम्बर  -  छोटे पौधों की पाली से रक्षा करने के लिए पौधों की घास फूस या सरकंडे की पत्तियों से ढककर रक्षा की जाती है। 

बुवाई का ढंग 

लौकी का बीज गड्ढों में या क्यारियों अथवा नालियों में बह जाता है पौधों की दूरी अग्र प्रकार रखते हैं-
          1. 5 ×1 मीटर  अथवा 2. 5 ×0. 60 
          (पक्ति से पक्ति की दुरी × पौधो पौधो की दुरी )

अधिक फैलने वाली किस्में एवं बरसाती फसल में 3× 1.5 मीटर दूरी रखनी चाहिए। 

 गड्ढे 30 सेंटीमीटर व्यास के उपरोक्त दूरी पर तैयार किए गए जाते हैं इनकी 15 से 20 सेंटीमीटर गहराई तक गुड़ाई  करके खाद और उर्वरक मिला दिया जाता है तथा प्रत्येक गड्ढे में तीन से चार बीज बो दिया जाता है बड़े होने पर गड्ढे में एक या दो स्वस्थ पौधे बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। 

क्यारियों में बोने के लिए 2.5 मीटर चौड़ी उठी हुई क्यारियाँ बनाते हैं क्यारियों  के बीच 7 सेंटीमीटर चौड़ाई की नाली रखते हैं क्यारियों के दोनों किनारों पर तीन से चार बीज इकट्ठे 60 सेमी की दूरी पर दिया जाता है जब कुछ पौधे बड़े हो जाएं तो एक स्थान पर एक या दो पौधे रखनी चाहिए। 

बीज की मात्रा 

4 से 5 किलोग्राम बीज एक हेक्टेयर के लिए पर्याप्त होता है जायद या ग्रीष्मकालीन फसल में अधिक बीज तथा  वर्षाकालीन फसल में कम बीज की आवश्यकता पड़ती है। 

खाद तथा उर्वरक 

लौकी  के लिए 250  से 300 क्विंटल गोबर की खाद तथा 40 से 50 किलोग्राम नाइट्रोज,न 30 -40 किग्रा फास्फोरस और 25 से 40 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता है गोबर की खाद खेत तैयार करते समय और बुवाई के समय नाइट्रोजन की एक बटे तीन मात्रा तथा फास्फोरस और पोटाश की पूर्ण मात्रा खेत में लगा देनी चाहिए। 

 नाइट्रोजन की शेष मात्रा दो बार में अर्थात  बोने के 30 दिन बाद फल  आने पर बराबर मात्रा में डालकर मिट्टी में मिला दें इसके बाद सिंचाई अवश्य करें। 

सिंचाई 

गर्मी की फसल को पाचवे दिन और जाड़े की फसल को 10 -15 दिन अंतर पर सिचाई करनी चाहिए। 

निराई गुड़ाई एवं देखभाल 

उगते हुए पौधों की विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है।  एक स्थान पर एक या दो पौधे बढ़ने देना चाहिए खरपतवारों को नियंत्रण में रखने के लिए तीन से चार निराई गुड़ाई करें पौधों की पानी से मुड़ जाने ना दें ग्रीष्म ऋतु में लौकी की बेल भूमि पर खेलकर बढ़ती है। 

 जबकि वर्षा ऋतु में पौधों को किसी आधार पर चढ़ाने की आवश्यकता होती है गांव में थप्पड़ों पर्स की बलि चढ़ा दी जाती है जहां कि वह खूब फलती-फूलती है। 

पादप नियामक या हार्मोन का प्रयोग

खीरा वर्गीय फसलों में नर पुष्प अधिक संख्या में पैदा होते हैं मादा पुष्पो की संख्या बढ़ाने के लिए एवं फल (जल्दी10 -15 दिन पहले ) प्राप्त करने के लिए पौधों की बढ़वार की अवस्था में एथिरेल हार्मोन  छिड़काव करना चाहिए इसके उपचार से उपज दुगनी होती है। 

मादा पुष्पों की संख्या बढ़ाने के लिए मेलिक हाइड्राज़ाइड (MH)या 2, 3, 5,-ट्राइआयोडोबेन्जोइक अम्ल (TIBA)  का 50 पी ० पी ० एम ० का छिड़काव कर सकते हैं। 

उपज 

. 150 -200 कु ० प्रति हेक्टेयर "

कीड़ो और बीमारियों की रोकथाम 

(1.)- लौकी का लाल भृंग (Red Pumpkin Beetle)

 पहचान -यह लाल रंग का होता है इसका सर गहरा भूरा या काळा रंग का होता है। 

रोकथाम -इसकी रोकथाम के लिए कारबराइल 0. 1 %(सेविन 50 WP )  कीटनाशी रसायन के 2 -3 छिड़काव करने चाहिए। 
राख में अगर हम मिट्टी के तेल की कुछ बुँदे मिला ले और मलमल के कपडे की थैली में भरकर पौधो के ऊपर छिड़काव करने से किट पत्तियों को नहीं खा सकते है। 

(2.)-माहूँ   

पहचान- माहू कीट काफी छोटे मुलायम हरे रंग के चूसने वाले कीट होते हैं यह पौधों के मुलायम भाग पर समूह में पाए जाते हैं। 

रोगथाम -जब पौधे छोटे हो और फल नहीं आ रहे हो उस समय डाईमेथोएट 0. 03%  30 ई सी ० छिड़काव करना चाहिए।

अगर फल आना  शुरु हो गए हो उस समय मैलाथियान 0. 1 % 50 ई सी ०  नामक कीटनाशी दो से तीन छिड़काव करने चाहिए छिड़काव के पहले सभी तैयार फलों को तोड़ लेना चाहिए।

लौकी की फल मक्खी 

पहचान-मक्खी लाल भूरे रंग की होती है जिसके पंख चमकीले रंग के होते हैं ऊपर का भाग लड्डू के आकार का होता है और इसका अंतिम सिरा नुकीला होता है जिसकी सहायता से मादा मक्खी फलों के भीतर अंडा देती हैं
रोगथाम -मेलाथियान का 1% का 600 से 800 लीटर घोल प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए। 
सड़े हुए पलों को एकत्रित करके गहरा जमीन में गाड़ देना चाहिए। 
 जिससे मक्खियां नष्ट हो जाएं छोटे स्तर पर फलों को पॉलिथीन पेपर से ढक देना चाहिए। 

लौकी का लाल पुती बग 

पहचान- यह किट लाल और काले रंग का चूसने वाला बग  होता है जिसको स्पर्श करने पर एक बदबूदार पदार्थ निकलता है ये कीट  पत्तियों औरकोमल बेलों का रस चूस कर हानि पहुंचाते हैं जिससे पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और सूख जाती है।  


रोगथाम - इसके नियंत्रण के लिए 10%  कारबराइल  5%  मैलाथियान धूल का 25 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए।  कारबराइल 0.1% (750 मी ० ली ० 500 लीटर पानी में घोलकर )  छिड़काव अधिक प्रभावशाली होता है। 

रोग 

चूरड़ी फफूद - इस रोग में पत्तियों के तनो  पर सफेद रंग की परत जम जाती है और बाद में पत्तियां भूरी  होकर सूख जाती हैं इसकी रोकथाम के लिए 2 किलोग्राम मोरोसाइड दवा को 625 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़के।  2 किलो घुलनशील गंधक के घोल का छिड़काव कर सकते हैं। 

कोमल फफूंदी-  पत्तियों के ऊपर पीला या लाल भूरा धब्बा पड़ जाता है इसके रोकथाम के लिए बोर्डेक्स  मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए अथवा डायथेन एम-45 के 0.2% घोल का छिड़काव करना चाहिए।

फल सड़न 

कद्दू वर्ग की सभी सब्जियों को फल सड़न रोग बहुत हानि पहुंचाता है यह रोग एक प्रकार की फफूंद के कारण होता है यह रोग  उन फलों को लगता है जो जमीन के संपर्क में रहते हैं या जमीन के काफी निकट लटक रहे होते हैं। 

यह रोग लगने पर सबसे पहले फल पर गहरे हरे रंग के दो धब्बे नजर आते हैं।  शुरू में यह धब्बे छोटे होते हैं ,फिर किंतु बाद में धीरे-धीरे बड़े हो जाते हैं हल्का धब्बे वाला भाग सड़ने लगता है रोकथाम इसकी रोकथाम के लिए फलों को भूमि में नहीं छूने देना चाहिए। और बालों को ऊपर चढ़ा देना चाहिए वातावरण में अधिक नमी होने पर बैलों पर फफूंद नाशक रसायन जैसे ब्लाईटास्क -50 या डाईथेन जेड -78 का 0. 3%   प्रतिशत छिड़काव करना चाहिए। 

मोजेक रोग 

रोगी पत्तियां पीली होकर सूख जाती हैं फलों का आकार खराब हो जाता है यह रोग विषाणु द्वारा फैलता है जिसे कीट फैलाते हैं इससे बचाव के लिए 0.2% मैलाथियान के घोल का 10 से 15 दिन के अंतर से छिड़काव करना चाहिए। 

  











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